Monday, 29 January 2018

इस तरह रखें ख्याल, वीर्य से है मर्दानगी और ताकत

       इस तरह रखें ख्याल, वीर्य से है मर्दानगी और ताकत


स्वास्थ्य और कामवासना के बीच जो संबंध है इस पर बहुत कम लोगों ने विचार किया है, परंतु एक वैज्ञानिक 
लेखक का कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बात को स्पष्ट करे. मनुष्य के शरीर में 3 क्रियाशील केंद्र हैं उनका परस्पर संबंध में एक कोई भी विषैला प्रभाव होने से दूसरे पर वैसा ही होता है. रक्त के दबाव के आधार पर मूत्र का बनना कम या अधिक होता है. आचार्य चतुरसेन ने अपनी पुस्तक काम कला के भेद में बताया है कि स्वस्थ शरीर के बिना व्यक्ति यौन संबंध के भरपूर सुख से वंचित रह जाता है...
यह बात तो प्रकट है कि जितना रक्त साफ़ होगा उसका प्रभाव भी उत्तम होगा. रक्त के दबाव पर ही वीर्यपात की मात्रा निर्भर है. कामदेव को स्थिर रखने में उत्तम पाचन शक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है. विज्ञान प्रत्येक बात को स्पष्ट कर देता है, चाहे वह उत्तम हो या ख़राब. ज्यों-ज्यों आयु बढ़ती जाती है स्वाभाविक रूप से हमें अपनी अंगों की सफ़ाई पर पूरा ध्यान देना चाहिए यदि आयु की वृद्धि के साथ क़ब्ज़ न बढ़े तो रक्त, वीर्य और मूत्र तीनों शुद्ध और निरोग रहेंगे. यदि कुछ काल तक क़ब्ज़ रहने लगेगा तो निश्चय ही रक्त अशुद्ध होने लगेगा.
क़ब्ज़ कैसे दूर किया जा सकता है इससे हमें निश्चित जान लेना चाहिए. क़ब्ज़ को दूर करने के लिए हमें आंतों के दुश्मनों को जानना चाहिए जो रहन-सहन की भूलों के कारण हमसे हो जाती हैं. क़ब्ज़ से हमें सिर्फ़ रक्त की अशुद्धि ही नहीं भोगनी पड़ती बल्कि हमारी पाचन शक्ति भी कम हो जाती है. पीठ की ओर जो बहुत सी मांसपेशियां हैं वह चिर काल तक निश्चेष्ट रहती है. परंतु यदि ये मांसपेशियां ठीक से अपना कार्य करें तो हम क़ब्ज़ की कठिनाई से बच सकते हैं. काम के लिए भलीभांति व्यायाम करना आवश्यक है.
आंतों का पूरा शक्तिशाली होना और क़ब्ज़ न करने देना अत्यंत आवश्यक है. इसी प्रकार मूत्र केंद्रों को यानी गुर्दों को का भी शुद्ध रहना आवश्यक है. बच्चे को मूत्र की हाजत होने पर हाथ पैर पटकते देखकर हम समझ सकते हैं कि सारी जीवन शक्ति उस हाजत के लिए उत्तेजित है. जब वह वस्त्रों में ही पेशाब कर देता है तो एकाएक शांत हो जाता है यदि मूत्र अपने तमाम विषयों को लेकर शरीर से बाहर नहीं जाता है तो रक्त में मिल जाता है जिसका ख़राब असर काम केंद्रों की शक्ति पर पड़ेगा.
कुछ लोगों में भ्रांति होती है कि कामवासना युवावस्था के लिए हानिकारक है. प्राचीन काल में यह ख़्याल था कि स्त्री को मासिक द्वारा जो रक्त आता है उससे उसका खून साफ़ हो जाता है. परन्तु वास्तव में बात कुछ और है. इसमें संदेह नहीं है कि दूषित रक्त बाहर निकल जाता है परंतु शरीर विज्ञान की दृष्टि से लड़कियों में कामवासना को सहन करने की शक्ति रक्तस्राव से ही उत्पन्न होती है.
युवक व्यक्ति में अचानक ही 2 लक्षण प्रकट हो जाते हैं. प्रायः युवा काम पर चर्चा करते हैं कि स्वप्नदोष हो जाना उनके लिए हानिकारक बात है और वे इससे बचने के लिए वैश्यागमन के ख़तरे को भी उठा लेते हैं. वे समझते है कि जब वीर्यपात होता है तो क्यों ना वैश्या द्वारा किया जाए, पर यह उनकी भूल है. इसमें कोई श़क नहीं कि इस प्रकार वीर्यपात होना अच्छा नहीं है पर यदि वह कभी-कभी होता है, तो इसमें उनका स्वास्थ्य ही सुधारता है और इससे हानि नहीं होती.
जब हम अत्यंत परिश्रम करें तो पसीना आने से बहुत सी गंदगी निकल कर सारे वस्त्रों को दूषित कर देती है और उन्हें शुद्ध करना पड़ता है. सर्दी के दिनों में यदि स्नान नहीं किया जा सकता तो भी सूखे अंगोछे से शरीर को पोछना ही पड़ेगा. कपड़े भी बदलने पड़ते हैं. इसी भांति स्वपनदोष होने पर वस्त्र बदले जा सकते हैं. इससे बचने के लिए वैश्यागमन करना अपने जीवन को और पवित्रता को ख़तरे में डालना एवं सर्वथा हानिकारक है. याद रखना चाहिए कि यदि सोती हुई पूरी उत्तेजना होकर स्वप्नदोष हो जाता है तो समझना चाहिए कि हमारे अंदर पूरी मर्दानगी है और प्रकृति हमारी मदद करती है. यह प्राकृतिक अवस्था उस समय तक रहेगी जबकि स्त्री संसर्ग के अवसर न आएं.
इस प्रकार के वीर्यपात से तरल एल्युबिमेन आदि मिले होते हैं उनका बाहर निकल जाना लाभदायक है. प्रत्येक वस्तु जिसमें जीवन है वह हमें मैला करती है यदि हम किसी फल को काटेंगे तो हमें हाथों को साफ़ करने की आवश्यकता होगी. इसलिए काम संबंधी मामलों में स्वप्नों में वीर्यपात होने पर अशुद्धि का ज़्यादा विचार नहीं करना चाहिए. हां उठने पर शरीर को शुद्ध कर लेना चाहिए
उत्तेजना कामवासना में बहुत महत्वपूर्ण है. यह उसी समय होगी जब उचित मात्रा में काम केंद्रों में रक्त का जमाव होगा या दूसरे स्थानीय स्नायु मंडल में उत्तेजना हो जाए. ये दोनों कारण परस्पर सहायक हैं. पेशाब और वीर्य में जो पारस्परिक संबंध है जब उसमें एक ख़ास संपदा उत्पन्न होती है तभी रक्त का जमाव काम केंद्रों में होता है. उत्तेजना के समय मूत्र त्यागने से उत्तेजना शांत हो जाती है. बच्चे जब मूत्र त्याग करना चाहते हैं तो उन्हें भी उत्तेजना हो जाती है. इसी प्रकार बड़ी उम्र में भी होता है.
वीर्यपात की क्रिया प्रबल रुकावट के साथ टक्कर खाती है. जो गाढ़ा वीर्य निकलता है वह दोनों नलियों द्वारा ढकेला जाकर बाहर आता है. रक्त का जमाव ही इसमें उसे मदद देता है. इस प्रकार काम की आकांक्षा की वृद्धि होने से तेज़ उत्तेजना होती है. वीर्य स्खलन रक्त के प्रवाह का पूरा प्रभाव रखता है. कामवासना होते ही पुरुष का चेहरा लाल हो जाता है. स्त्रियों के लिए यह बात ख़राब है कि उन्हें बार-बार उत्तेजना हो. पुरुष तो वीर्यपात के बाद उससे फ़ारिग हो जाते हैं पर स्त्री को गर्भधारण करना पड़ता है. 
शरीर का निर्माण करने की शक्ति हमारे रक्त में है जैसे छोटी-छोटी ईंटों से मकान बनते हैं उसी प्रकार रक्त कणों के द्वारा हमारा शरीर बनता और रक्त के प्रभाव के साथ जीवन शक्ति सारे शरीर को मिलती है. रक्त के प्रवाह में जो कमी ज़्यादती होती रहती है उसी पर हमारे स्वास्थ्य की स्थिरता निर्भर है. रक्त के प्रवाह में जल्दी-जल्दी परिवर्तन  स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है. रक्त में अनेक प्रकार के ऊतक होते हैं.
शरीर की मालिश कराने से रक्त का दबाव बढ़ता है. इससे रक्त को उत्तमता मिलती है. मालिश सिर्फ़ आराम की वस्तु नहीं है. वास्तव में जीवन में बहुत ही सहायक है. इससे शरीर के अंग सुडौल और लचीले तथा अंदर सुव्यवस्थित होते हैं.
काम संबंधी उत्तेजना शरीर में एक आग जलाती है और इस आग से कीड़े-मकोड़े भी उन्मत्त होकर सजीव हो जाते हैं. जब हम किसी के गुलाबी गालों को देखते हैं तो हमें प्रसन्नता और उत्तेजना होती है क्योंकि इससे रक्त की उत्तमता का संबंध है. जितना ही हमारा रक्त उत्तेजित होगा उतना ही हमारा स्वास्थ्य उत्तम होगा और रक्त का उत्तम प्रकार कामोत्तेजना ही है.


                               Posted by ....... Akash Dwivedi 

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